मागधी लोक संगीत का संरक्षण

                                             सुधाकर राजेन्द  
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सुधाकर राजेन्द्र
लोक-कलाओं की विविधता के लिए प्रसिद्ध मगध के लोक जीवन में लोक संगीत का विशेष महत्व है। आधुनिकता के होड़ में लोक गायक और वादक कलाकार धीरे- धीरे लोप होते जा रहे हैं। मगध के जनजीवन के लोक कलाकार आधुनिक होते समाज में अपनी भूमिका ठीक से नही निभा पा रहे हैं। जो कलाकार लोक संगीत के स्वर को सदियो से संरक्षित करते आए है आज इस कला को छोड़ने के लिए विवश हैं जिनका संरक्षण आवश्यक है।

          एक समय था कि लोक कलाकारों की आम जन जीवन में बड़ी
इज्जत और मांग थी। विशेष समारोह और धर्मिक अवसरों पर ये कलाकार अपने लोक संगीत और वाद्ययंत्रो के साथ लोकगीत और नृत्य का हुनर दिखा कर धन राशि के साथ पुरस्कार अर्जित करते थे। लोक गीतो में संस्कार गीत, पर्व गीत, श्रम गीत, प्रेम मनोरंजन गीत, गाथा गीत और ट्टतु गीत प्रमुख है। लोरिकायन, विरहा, अल्हा, भरथरी, विहुला, सारंगा आदि मगध के चर्चित लोक गाथा गीत हैं। बारहमासा, कजरी, चैता होली, चौहट मगध के ख्यात टटतु गीत है। विवाह, तिलकोत्सव और जन्मोत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले मगध के संस्कार गीत है। रोपनी और जाँता पिसते या पफसल काटते समय गाए जाने वाले गीत श्रम या क्रिया गीत कहलाते हैं। इसके अलावे प्रेम और मनोरंजन के अनेका अनेक गीत मगध की लोक संस्कृति के अमूल्य धरोहर हैं पर फिलहाल इन धरोहरो को जीवित और इस कला को आगे बढ़ाने की जरूरत हैं।

          मगध की मुख्य भाषा मगही-मागधी है। इसी भाषा को मगध वासी मातृभाषा की संज्ञा देते हैं क्योकि इसी भाषा को जन्म से लेकर मरण तक अपने मुख से मुखरित करते रहे है। मगध का लोक कलाकार जब अपनी मगही भाषा में विराहा का अलाप लेता है तो उसके स्वर को सुनकर कोई भी बटोही थोड़े देर के लिए ठिठक जाता हैं।

  कहमां में चमकई बाबू चेल्हवा मछलिया

 आ कहमें चमकई तलवार,

 कहमां में चमक हई पिया के पगरिया

 कि कहमां में विंदिया हमार?

मगही भाषा का मिठास और इसके शब्दो में भाव सम्प्रेषण की क्षमता लोगो के दिल को आहलादित कर देती है यही कारण है कि लोक गायक श्रोताओ के दिलो में बस जाते हैं। इस लोक संगीत का संरक्षण आवश्यक है।

          मगध के लोक बाद्य यंत्रो में ढोलक, झाल, करताल, हारमोनियम, वांसुरी, नगाड़ा, तासा खंजड़ी, चिमटा आदि का प्रमुख स्थान हैं। ढोलक लोक जीवन के हर संस्कार से जुड़ा हुआ वाद्य यंत्रा है। मगध के गाँवों में ढोलक के एक से एक अच्छे वादक कलाकार है। इनकलाकारो में कुछ ऐसे कलाकार है जो विलकुल निरक्षर होते हुए भी लोक गायन के स्थाई अन्तरा आरोह
 

अवरोह के विशेषज्ञ है। उनकी वादन कला में कोई सर्मज्ञ कलाकार भी त्रुटी नही निकाल पाते। पुरूषों के अलावे मगध में ढोलक बादन कला में महिलाए भी आगे आ रही है जो लोक कला के लिए शुभ है। ढोलक
के अलावे मगध का चर्चित वाध्य यंत्रा है झाल जिसे लोग जोड़ी भी कहते है। होली चैतार और किर्तन मंडली में जब वृताकार बैठकर मगध के लोक कलाकार अपनी कला की प्रस्तुती झाल बजाकर करते है तो उसकी शमा देखते ही बनती है। देखने में सामान्य सा लगने वाला इस वाध्य यंत्रा के कलाकार जब अपनी कला प्रस्तुत करते है तो इसकी स्वर लहरियां हृदय को तरंगित किए बिना नही रहती। इसी प्रकार मगध जनपद में लोक संगीत को गति देने वाले तमाम वाध यंत्रो की स्वर लहरियां जन जीवन मे आह्लाद भरती रही है।


          मगध महाजनपद में पुरूषो के अलावे महिला कलाकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मगधंचल की धरती पर आंचलिक महिलाओ की स्वर लहरियों से कुछ ऐसे लोक गीतों की रचना हुई हैं जो अमर गीत हैं जिसमें मारवउ रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरझाए,निमियां के डार मईया लागल हिड़ोलवा से झूमी-झुमी, शिव के दुलारी गंगा निरमल धार गे माई के अलावे दर्जनाधिक संस्कार गीत हैं जो सदियो से परम परागत मुखरित होते चले आ रह हैं, जिसमें केकर रोवल गंगा वही गेलई
केकर रोवल समुन्दर हे, चौहट गीतो में कहमां ही बरसल मयगर हथिया या सॉप छोड़ले साँप केचुल गंगा मईया छोड़ले अरार आदि प्रमुख गीत हैं।

          आज मगध महाजनपद के युवाओं का दायित्व है कि फिल्मी चकाचौध और आधुनिकाता की प्रदिूषित हवा को त्याग कर अपने पूर्वजों की विरासत लोक संगीत को संरक्षित करते हुए इसे मंजिल की ओर पहुचाने में अपनी भूमिका सुनिश्चित करें, तभी मगध का लोक संगीत मंजिल तक पहुंच सकता है।

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भ्रष्टाचार देश द्रोह है.
 
                                                         सुधाकर राजेन्द्र
 
नियम के विरूद्ध क्रिया कलाप ही भ्रष्टाचार है. भ्रष्टाचार का मतलब है भ्रष्ट आचरण जब कोई व्यक्ति अपने लाभ के लिए कानून, नियम और नैतिक मूल्यों के खिलापफ अनुचित आचरण करता है तो वह भ्रष्टाचारी कहलाता है। आज भ्रष्टाचार की समस्या से समग्र भारत ग्रस्त है लोक सेवाओं में भी भ्रष्टाचार की वृदि हुई है। भ्रष्ट देशों में भारत का सातवाँ स्थान है। आज जीवन का कोई भी क्षेत्र भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है। भ्रष्टाचार ने देश के प्राचीन संस्कृति के जड़ को उखाड़ दिया हैं। भारतीय समाज अपनी पहचान खो चुका है। भ्रष्टाचार की प्रकृति ने तो मौलिक अधिकारों का अपहरण किया ही है, मानवीय अधिकारों का भी हनन किया है। आज समग्र देश भ्रष्टाचार में डूबा हैं। भारत में भ्रष्टाचार के कई कारण हैं उनमें प्रमुख हैं नैतिक मूल्यों का पतन, वैचारिक और सांस्कृतिक प्रदूषण, भौतिकवादी, विलासितावादी जीवन शैली, जटिल न्यायिक प्रकिया, राजनीतिक अपराधिकरण, सरकारी सेवाओं का राजनीतिकरण और कानूनी कारवाइयों का अभाव। आजादी के बाद भारत का एकमात्रा लक्ष्य था देश का सर्वांगीण समुचित विकास, किन्तु अपेक्षित विकास में भारत अब तक असपफल रहा है। भौतिकवादी भोग लिप्सा ने व्यक्ति को स्वार्थी और अंधा बना दिया है। फलतः व्यक्ति आज उचित और अनुचित में भेद करने में असमर्थ हैं। विलासिता की आवश्यक्ताओं की पूर्ति में भ्रष्ट तरीकों को अपनाने में लोगों को तनिक भी शर्म नहीं होती। इस स्थिति के लिए उच्च स्तर की राजनीतिक भ्रष्टाचार ही दोषी हैं। देश में घोटालों की चर्चा आम हैं। घोटालेवाजों के खिलापफ ठोस कदम उठाने की पहल का अभाव है। घोटालेवाजों के खिलापफ जटिल न्यायिक दीध्र कालीन प्रकिया के कारण वह बच निकलता है। फलतः भ्रष्टाचार को बल मिलता है। चुनाव में बडे़ व्यवसायी राजनीतिज्ञों को चुनाव फंड में लाखों चन्दा देते हैं। फलतः चुनाव जीतने के बाद राजनेता व्यापारियों को अवैध् और अनैतिक पैसा कमाने के लिए खुली छुट दे देते हैं। फलतः बडे़ पैमाने पर भ्रष्टाचार फलता फूलता है। जिसके कारण अपराधिकरण की संस्कृति पनपती है। शिक्षण संस्थाएं भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हैं। प्राथमिक विद्यालय का छात्र भी पैसा देकर पास करने की बात करता है। ऐसा विद्यार्थी आगे चलकर कैसा आचरण अपनाएगा? नौकरियों में लोग घूस देकर पद पा रहे हैं वे पद पर बैठकर कैसा आचरण करेंगें? इन सबके जड़ में हैं वैधनिक एवं कठोर कानूनी कारवाईयों का अभाव। ट्रंसपरेंसी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा ग्यारह सरकारी कार्यालयों में किए गए सर्वे के अनुसार भारत में सबसे अधिक भ्रष्ट पुलिस महकमा है, दूसरे स्थान पर हैं भूमि प्रशासन और तीसरे स्थान पर है न्यायिक सेवा

इस तरह भ्रष्टाचार के इस देशद्रोही रोग से कोई भी क्षेत्रा या विभाग आज विमुक्त नहीं है। भ्रष्टाचार के इस रोग से हमारा देश भारत कैसे मुक्त होगा यह एक अहम विचारणीय सवाल है।                   

 

      दुर्व्यवहार के बाद नारी , समाज और कानून
                          सुधाकर राजेन्द्र

 

आज हमारे देश में बलात्कार की घटनाएं अखबार की सुर्खियां बन रही हैं. बलात्कार की घटनाओं मे काफी वृद्धि हो रही है. अपने देश में आरक्षी खोज एवं विकास ब्यूरों के आँकड़ो के अनुसार प्रति दो घंटे के भीतर एक बलात्कार की घटना घट रही है. यह संख्या पिछले दो दशको की तुलना में दूनी है.

किसी युवती के शारीरिक तथा मानसिक विकास पर बलात्कार की घटना का क्या प्रभाव पड़ता है इस घटना के बाद कौन-कौन सी समस्याएं जन्म लेती हैं इस संबंध् में डॉ. वी राघवन ने बलात्कार की शिकार युवती तथा बलात्कारी की मानसिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए कुछ विचारोतेजक परिणाम घोषित करते हुए लिखा है- ‘पुलिस के हाथों पकड़े जाने पर भी बलात्कारी  अधिकतर केसों में फंसने से सापफ तौर पर बच कर निकल जाता है. वह कानून को अंगूठा दिखाने में इसलिए सफल हो जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम तो बलात्कार की शिकार युवती के अभिभावक इस अपराध् की रपट थाने में दर्ज कराने में सापफ तौर पर मुकर जाते हैं. कारण कि अभिभावक या माता-पिता का यह मानना होता है कि क्या बेटी का सुरक्षित कौमार्य पुलिस या कानून लौटा देगी?

ऐसी घटनाओं में परिचित युवकों मित्रों और शुभ-चितकों के ही हाथ पाये जाते है. जिनके खिलाफ थाने में रपट लिखवाकर बेटी की बदनामी तथा उन्हें अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खोने का भय सताने लगता है, इसलिए भी लोग अपराधी के विरूद्ध थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने में कतराते हैं.

यदि बलात्कारी को पुलिस कानूनी तौर पर सजा दिलाने में कामयाब हो भी जाती है तो छूटने के बाद अपराधी देख लेने की  धमकी देना नहीं भूलता, इसलिए कुछ लोग नहीं चाहते हैं कि यह मामला पुलिस और कोर्ट कचहरी तक पहुंचे ऐसे अधिकाश केसों में वकील बलात्कार की शिकार युवती से सिर्फ उत्तेजक और आपतिजनक सवाल कर परेशान करते हैं बल्कि यह साबित करने का प्रयास भी करते है कि घटना के लिए जिम्मेवार युवती हीं है, इसलिए चरित्राहीन और बदचलन वही मानी जाती है, ऐसी परिस्थिति में बलात्कार का दुख भोगती युवती की मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस पर क्या बीतती होगी? जो युवती बलात्कार की पीड़ा और तनाव को भूलना चाहती है, उसे कौमार्य खोने और अपमान सहने के लिए विवश करना कहाँ तक न्यायसंगत है? एक युवती के मन में जबरन बोया गया पराजय का यह बीज किस प्रकार की चेतना जागृत करेगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है, जिसे सभ्य समाज के प्रबुदध व्यक्तियों को गंभीरतापूर्वक विचार कर एक सर्वसम्मत निर्णय तक पहुँचने की आवश्यकता है.

डॉ. राघवन के अनुसार अधिकाश बलात्कार की घटनाएं दोपहर 12 बजे से रात्रि आठ बजे के बीच होती है जिसमें 20 से 25 वर्ष तक के बलात्कारी होते हैं, अपराधी अपनी पूर्व योजना के अनुसार जब बलात्कार करने में सपफल हो जाता है तब वह गहरे तनाव में होता है, इसलिए उसे कुछ भी कर गुजरने में हिचक नहीं होती, जबकि बलात्कार के बाद युवती पारिवारिक तथा सामाजिक दोनों ही स्तर पर मानसिक यंत्राणा और कटाक्ष झेलने के लिए विवश होती है. हमारा दंड और न्याय विधन भी इस मामले में इतना पेचीदा है कि यदि कोई नारी न्याय पाना भी चाहती है तो  उसे काफी वक्त लग जाता है. अधिकाश ऐसे मुकदमों का निर्णय होने में बरसों गुजर जाते है, इस बीच बलात्कारी सिर्फ जमानत पर छूट जाता है बल्कि उस युवती के परिवार को मुकदमा वापस लेने के लिए अपनी अपराधी प्रवृति का प्रदर्शन करते हुए दबाब भी डालता है, इस बलात्कार से संबंधित अनेक सबूत भी मिटा दिये जाते हैं या सबूतों 

में फेर बदल कर केस को अत्यंत कमजोर बना दिया जाता है.

इसका परिणाम यह होता है कि घर परिवार के उपेक्षित व्यवहार से पीड़ित युवती अपने भीतर आत्मविश्वास की घोर कमी अनुभव करने लगती है. स्वयं को प्रत्येक स्तर पर असुरक्षित पाती है. उसे कुंठाएं तथा हीन भावनाएं जकड़ लेती हैं, कारण कि ऐसी घटनाओं की शिकार युवती के प्रति अधिकाशतः परिवारों में बड़े बुजुर्गो का दृष्टिकोण भी व्यवहार के स्तर पर असहयोगात्मक ही होता है. उनके साथ सहानुभूति पूर्ण रवैया नहीं अपनाया जाता, बल्कि परिवार वाले औरों की तरह उसे ही दोषी ठहराने से नहीं चूकते. नारी या युवती के मन में ऐसी हीन भावना घर कर जाती है कि वह भी परिस्थितियों में स्वयं को विवशतावश दोषी मान लेती है, क्योंकि सभी उसे इसी दृष्टिकोण से देखते है. इस प्रकार बलात्कार की यातना भोग चुकी नारी या युवती इसके लिए हर प्रकार से दोषी ठहरा दी जाती है. यह व्यवस्था आज भी एक चुनौती है, जिसका समाधन अत्यंत आवश्यक है।